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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४३
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व्रह्मो उवाच
निर्द्वन्द्वो निर्नमस्कारो निःस्वधाकार एव च |  ४०   क
अचलश्चानिकेतश्च क्षेत्रज्ञः स परो विभुः ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति