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द्रोण पर्व
अध्याय २०
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सञ्जय़ उवाच
तत आचार्यपाञ्चाल्यौ युय़ुधाते परस्परम् |  ४   क
विक्षोभय़न्तौ तत्सैन्यमिन्द्रवैरोचनाविव ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति