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आदि पर्व
अध्याय ६१
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वैशम्पाय़न उवाच
धृतराष्ट्र इति ख्यातः कृष्णद्वैपाय़नादपि |  ७८   क
दीर्घवाहुर्महातेजाः प्रज्ञाचक्षुर्नराधिपः |  ७८   ख
मातुर्दोषादृषेः कोपादन्ध एव व्यजाय़त ||  ७८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति