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अनुशासन पर्व
अध्याय ५७
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वैशम्पाय़न उवाच
दीपालोकप्रदानेन चक्षुष्मान्भवते नरः |  २२   क
प्रेक्षणीय़प्रदानेन स्मृतिं मेधां च विन्दति ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति