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द्रोण पर्व
अध्याय १६२
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सञ्जय़ उवाच
मज्जत्सु चक्रेषु रथान्सत्त्वमास्थाय़ वाजिनः |  १९   क
कथञ्चिदवहञ्श्रान्ता वेपमानाः शरार्दिताः |  १९   ख
कुलसत्त्ववलोपेता वाजिनो वारणोपमाः ||  १९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति