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द्रोण पर्व
अध्याय २०
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सञ्जय़ उवाच
ततः सत्यजितं तीक्ष्णैर्दशभिर्मर्मभेदिभिः |  ५   क
अविध्यच्छीघ्रमाचार्यश्छित्त्वास्य सशरं धनुः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति