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द्रोण पर्व
अध्याय २०
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सञ्जय़ उवाच
ते दानवा इवेन्द्रेण वध्यमाना महात्मना |  ५३   क
पाञ्चालाः केकय़ा मत्स्याः समकम्पन्त भारत ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति