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अनुशासन पर्व
अध्याय १८
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वैशम्पाय़न उवाच
नष्टपानीय़यवसे मृगैरन्यैश्च वर्जिते |  १९   क
अय़ज्ञीय़द्रुमे देशे रुरुसिंहनिषेविते |  १९   ख
भविता त्वं मृगः क्रूरो महादुःखसमन्वितः ||  १९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति