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कर्ण पर्व
अध्याय २९
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सञ्जय़ उवाच
वैश्वानरं धूमशिखं ज्वलन्तं; तेजस्विनं लोकमिमं दहन्तम् |  १४   क
मेघो भूत्वा शरवर्षैर्यथाग्निं; तथा पार्थं शमय़िष्यामि युद्धे ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति