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शल्य पर्व
अध्याय २०
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सञ्जय़ उवाच
चापवेगवलोद्धूतान्मार्गणान्वृष्णिसिंहय़ोः |  १४   क
आकाशे समपश्याम पतङ्गानिव शीघ्रगान् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति