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शल्य पर्व
अध्याय २०
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सञ्जय़ उवाच
स दीर्घवाहुः सङ्क्रुद्धस्तोत्त्रार्दित इव द्विपः |  १६   क
अष्टाभिः कृतवर्माणमविध्यत्परमेषुभिः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति