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शान्ति पर्व
अध्याय २८६
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पराशर उवाच
एकः शत्रुर्न द्वितीय़ोऽस्ति शत्रु; रज्ञानतुल्यः पुरुषस्य राजन् |  २८   क
येनावृतः कुरुते सम्प्रय़ुक्तो; घोराणि कर्माणि सुदारुणानि ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति