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आदि पर्व
अध्याय २००
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्याश्चापि स धर्मात्मा सत्यवागृषिसत्तमः |  १५   क
आशिषो विविधाः प्रोच्य राजपुत्र्यास्तु नारदः |  १५   ख
गम्यतामिति होवाच भगवांस्तामनिन्दिताम् ||  १५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति