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वन पर्व
अध्याय ८३
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वैशम्पाय़न उवाच
युधिष्ठिरोऽपि धर्मात्मा तमेवार्थं विचिन्तय़न् |  ११४   क
तीर्थय़ात्राश्रय़ं पुण्यमृषीणां प्रत्यवेदय़त् ||  ११४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति