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शान्ति पर्व
अध्याय १०४
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भीष्म उवाच
प्राप्ते च प्रहरेत्काले न स संवर्तते पुनः |  १९   क
हन्तुकामस्य देवेन्द्र पुरुषस्य रिपुं प्रति ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति