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शान्ति पर्व
अध्याय १७५
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भृगुरु उवाच
पठन्ति चैव मुनय़ः शास्त्रेषु विविधेषु च |  ३१   क
त्रैलोक्ये सागरे चैव प्रमाणं विहितं यथा |  ३१   ख
अदृश्याय़ त्वगम्याय़ कः प्रमाणमुदाहरेत् ||  ३१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति