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वन पर्व
अध्याय २८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
सञ्ज्ञां च सत्यवाँल्लव्ध्वा सावित्रीमभ्यभाषत |  ६२   क
प्रोष्यागत इव प्रेम्णा पुनः पुनरुदीक्ष्य वै ||  ६२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति