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वन पर्व
अध्याय २५४
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो घोरतरः शव्दो वने समभवत्तदा |  १   क
भीमसेनार्जुनौ दृष्ट्वा क्षत्रिय़ाणाममर्षिणाम् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति