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वन पर्व
अध्याय २००
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मार्कण्डेय़ उवाच
कर्मजा हि मनुष्याणां रोगा नास्त्यत्र संशय़ः |  १४   क
आधिभिश्चैव वाध्यन्ते व्याधैः क्षुद्रमृगा इव ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति