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वन पर्व
अध्याय २००
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मार्कण्डेय़ उवाच
येषामस्ति च भोक्तव्यं ग्रहणीदोषपीडिताः |  १६   क
न शक्नुवन्ति ते भोक्तुं पश्य धर्मभृतां वर ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति