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वन पर्व
अध्याय २००
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मार्कण्डेय़ उवाच
इति लोकमनाक्रन्दं मोहशोकपरिप्लुतम् |  १८   क
स्रोतसासकृदाक्षिप्तं ह्रिय़माणं वलीय़सा ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति