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वन पर्व
अध्याय २००
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मार्कण्डेय़ उवाच
न म्रिय़ेय़ुर्न जीर्येय़ुः सर्वे स्युः सार्वकामिकाः |  १९   क
नाप्रिय़ं प्रतिपश्येय़ुर्वशित्वं यदि वै भवेत् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति