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वन पर्व
अध्याय २००
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मार्कण्डेय़ उवाच
श्रुतिप्रमाणो धर्मो हि वृद्धानामिति भाषितम् |  २   क
सूक्ष्मा गतिर्हि धर्मस्य वहुशाखा ह्यनन्तिका ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति