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वन पर्व
अध्याय २००
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मार्कण्डेय़ उवाच
उपर्युपरि लोकस्य सर्वो गन्तुं समीहते |  २०   क
यतते च यथाशक्ति न च तद्वर्तते तथा ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति