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वन पर्व
अध्याय २००
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मार्कण्डेय़ उवाच
न कश्चिदीशते व्रह्मन्स्वय़ङ्ग्राहस्य सत्तम |  २२   क
कर्मणां प्राकृतानां वै इह सिद्धिः प्रदृश्यते ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति