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वन पर्व
अध्याय २००
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व्याध उवाच
अनसूय़ुः कृतज्ञश्च कल्याणान्येव सेवते |  ४०   क
सुखानि धर्ममर्थं च स्वर्गं च लभते नरः ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति