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वन पर्व
अध्याय २००
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व्याध उवाच
सतां धर्मेण वर्तेत क्रिय़ां शिष्टवदाचरेत् |  ४२   क
असङ्क्लेशेन लोकस्य वृत्तिं लिप्सेत वै द्विज ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति