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वन पर्व
अध्याय २००
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व्याध उवाच
शव्दं स्पर्शं तथा रूपं गन्धानिष्टांश्च सत्तम |  ४६   क
प्रभुत्वं लभते चापि धर्मस्यैतत्फलं विदुः ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति