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वन पर्व
अध्याय २००
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व्याध उवाच
धर्मस्य च फलं लव्ध्वा न तृप्यति महाद्विज |  ४७   क
अतृप्यमाणो निर्वेदमादत्ते ज्ञानचक्षुषा ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति