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वन पर्व
अध्याय २००
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व्याध उवाच
सर्वत्यागे च यतते दृष्ट्वा लोकं क्षय़ात्मकम् |  ४९   क
ततो मोक्षे प्रय़तते नानुपाय़ादुपाय़तः ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति