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वन पर्व
अध्याय २००
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मार्कण्डेय़ उवाच
यत्करोत्यशुभं कर्म शुभं वा द्विजसत्तम |  ५   क
अवश्यं तत्समाप्नोति पुरुषो नात्र संशय़ः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति