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भीष्म पर्व
अध्याय ४९
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सञ्जय़ उवाच
पाञ्चाल्यमभिसन्त्यज्य द्रोणोऽपि रथिनां वरः |  ३९   क
विराटद्रुपदौ वृद्धौ योधय़ामास सङ्गतौ |  ३९   ख
धृष्टद्युम्नोऽपि समरे धर्मराजं समभ्ययात् ||  ३९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति