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वन पर्व
अध्याय २००
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मार्कण्डेय़ उवाच
विषमां च दशां प्राप्य देवान्गर्हति वै भृशम् |  ६   क
आत्मनः कर्मदोषाणि न विजानात्यपण्डितः ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति