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वन पर्व
अध्याय २००
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मार्कण्डेय़ उवाच
मूढो नैकृतिकश्चापि चपलश्च द्विजोत्तम |  ७   क
सुखदुःखविपर्यासो यदा समुपपद्यते |  ७   ख
नैनं प्रज्ञा सुनीतं वा त्राय़ते नैव पौरुषम् ||  ७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति