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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ११
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धृतराष्ट्र उवाच
ते च द्वादश कौन्तेय़ राज्ञां वै विविधात्मकाः |  ४   क
मन्त्रिप्रधानाश्च गुणाः षष्टिर्द्वादश च प्रभो ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति