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उद्योग पर्व
अध्याय ८८
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वैशम्पाय़न उवाच
विक्रमाधिगता ह्यर्थाः क्षत्रधर्मेण जीवतः |  ७८   क
मनो मनुष्यस्य सदा प्रीणन्ति पुरुषोत्तम ||  ७८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति