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सौप्तिक पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
अत्र यद्धितमस्माकं लोकानां चैव सर्वथा |  ४   क
भवन्तौ देवसङ्काशौ तथा संहर्तुमर्हतः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति