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द्रोण पर्व
अध्याय ८५
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सञ्जय़ उवाच
भारद्वाजं च ते सर्वे न शेकुः प्रतिवीक्षितुम् |  २४   क
मध्यन्दिनमनुप्राप्तं सहस्रांशुमिव प्रभो ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति