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वन पर्व
अध्याय २०१
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व्राह्मण उवाच
व्रवीषि सूनृतं धर्मं यस्य वक्ता न विद्यते |  १२   क
दिव्यप्रभावः सुमहानृषिरेव मतोऽसि मे ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति