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अनुशासन पर्व
अध्याय २
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भीष्म उवाच
रत्नैर्धनैश्च पशुभिः सस्यैश्चापि पृथग्विधैः |  १४   क
नगरं विषय़श्चास्य प्रतिपूर्णं तदाभवत् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति