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वन पर्व
अध्याय २०१
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व्याध उवाच
अधर्मस्त्रिविधस्तस्य वर्धते रागदोषतः |  ८   क
पापं चिन्तय़ते चापि व्रवीति च करोति च ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति