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द्रोण पर्व
अध्याय १५८
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सञ्जय़ उवाच
भक्तश्च मे महावाहुः प्रिय़ोऽस्याहं प्रिय़श्च मे |  ३२   क
येन विन्दामि वार्ष्णेय़ कश्मलं शोकतापितः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति