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शान्ति पर्व
अध्याय २०२
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भीष्म उवाच
सर्वे च समभिद्रुत्य वराहं जगृहुः समम् |  १७   क
सङ्क्रुद्धाश्च वराहं तं व्यकर्षन्त समन्ततः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति