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शान्ति पर्व
अध्याय ३१
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नारद उवाच
तच्छ्रुत्वा सृञ्जय़ो वाक्यं पर्वतस्य महात्मनः |  १८   क
प्रसादय़ामास तदा नैतदेवं भवेदिति ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति