वन पर्व  अध्याय ४५

वैशम्पाय़न उवाच

स निवासोऽभवद्विप्र विष्णोर्जिष्णोस्तथैव च |  २०   क
यतः प्रववृते गङ्गा सिद्धचारणसेविता ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति