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वन पर्व
अध्याय २०२
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व्याध उवाच
रथः शरीरं पुरुषस्य दृष्ट; मात्मा निय़न्तेन्द्रिय़ाण्याहुरश्वान् |  २१   क
तैरप्रमत्तः कुशली सदश्वै; र्दान्तैः सुखं याति रथीव धीरः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति