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वन पर्व
अध्याय २०२
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व्याध उवाच
इन्द्रिय़ाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीय़ते |  २४   क
तदस्य हरते वुद्धिं नावं वाय़ुरिवाम्भसि ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति