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शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
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नारद उवाच
स्रवन्ति न निवर्तन्ते स्रोतांसि सरितामिव |  ५   क
आय़ुरादाय़ मर्त्यानां रात्र्यहानि पुनः पुनः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति