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शान्ति पर्व
अध्याय १०४
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भीष्म उवाच
अशक्यमिति कृत्वा वा ततोऽन्यैः संविदं चरेत् |  २६   क
व्रह्मदण्डमदृष्टेषु दृष्टेषु चतुरङ्गिणीम् ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति