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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २०
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वैशम्पाय़न उवाच
कम्वलाजिनरत्नानि ग्रामान्क्षेत्रानजाविकम् |  ४   क
अलङ्कारान्गजानश्वान्कन्याश्चैव वरस्त्रिय़ः |  ४   ख
आदिश्यादिश्य विप्रेभ्यो ददौ स नृपसत्तमः ||  ४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति