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शान्ति पर्व
अध्याय २०३
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गुरुरु उवाच
पितॄन्देवानृषींश्चैव तथा वै यक्षदानवान् |  १३   क
नागासुरमनुष्यांश्च सृजते परमोऽव्ययः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति